India-German 2026: Friedrich Merz की ‘अहमदाबाद-बेंगलुरु’ नीति के 7 रणनीतिक मायने
India-German 2026: Friedrich Merz की ‘अहमदाबाद-बेंगलुरु’ नीति के 7 रणनीतिक
2026 में कूटनीति का नया अध्याय और India-German 2026: Friedrich Merz की ऐतिहासिक यात्रा
आज, 11 जनवरी 2026 को, India-German संबंधों के इतिहास में एक नया पन्ना जुड़ रहा है। जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ (Friedrich Merz) अपनी पहली आधिकारिक भारत यात्रा पर पहुंचे हैं। यह यात्रा केवल कूटनीतिक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह बदलते वैश्विक समीकरणों, भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं और दोनों देशों की रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) की खोज का प्रमाण है।
सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि चांसलर मर्ज़ ने अपनी यात्रा के लिए पारंपरिक राजधानी नई दिल्ली के बजाय अहमदाबाद और बेंगलुरु को चुना है। यह निर्णय स्पष्ट संकेत देता है कि जर्मनी अब भारत के साथ अपने संबंधों को केवल राजनीतिक गलियारों तक सीमित नहीं रखना चाहता, बल्कि वह भारत के आर्थिक और तकनीकी इंजनों—गुजरात और कर्नाटक—से सीधे जुड़ना चाहता है।
नई दिल्ली नहीं, अहमदाबाद क्यों? कूटनीतिक प्रोटोकॉल में बदलाव
पारंपरिक रूप से, किसी भी राष्ट्राध्यक्ष की भारत यात्रा का केंद्र नई दिल्ली होता है, जहाँ रायसीना हिल्स पर औपचारिक स्वागत और हैदराबाद हाउस में द्विपक्षीय वार्ताएं होती हैं। लेकिन चांसलर मर्ज़ का अहमदाबाद में उतरना ‘व्यावहारिक कूटनीति’ (Pragmatic Diplomacy) का उदाहरण है। अहमदाबाद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गृह राज्य और भारत का औद्योगिक पावरहाउस है।
यहाँ होने वाली बैठकें केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि भारी निवेश और औद्योगिक सहयोग पर केंद्रित होंगी। इसके अलावा, मकर संक्रांति के अवसर पर अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्सव में उनकी उपस्थिति दोनों देशों के बीच ‘सॉफ्ट पावर’ और सांस्कृतिक जुड़ाव को मजबूत करेगी। यह कदम दर्शाता है कि जर्मनी भारत के संघीय ढांचे (Federal Structure) के महत्व को पहचान रहा है और सीधे उन राज्यों से जुड़ रहा है जो आर्थिक विकास की धुरी हैं।
Friedrich Merz: नया नेतृत्व, नई दिशा और ‘जर्मनी फर्स्ट’ की नीति
मई 2025 में कार्यभार संभालने के बाद, क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (CDU) के नेता Friedrich Merz की यह पहली एशिया यात्रा है। ओलाफ स्कोल्ज़ के बाद, मर्ज़ का दृष्टिकोण अधिक व्यापार-उन्मुख और सुरक्षा-केंद्रित माना जाता है।
उनकी विदेश नीति में ‘डी-रिस्किंग’ (De-risking) एक प्रमुख तत्व है, जिसका अर्थ है चीन पर जर्मनी की अत्यधिक आर्थिक निर्भरता को कम करना। इस संदर्भ में, भारत उनके लिए सबसे स्वाभाविक और महत्वपूर्ण भागीदार बनकर उभरा है। मर्ज़ का नेतृत्व भारत को केवल एक बाजार के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे विश्वसनीय रणनीतिक साझेदार के रूप में देखता है जो इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में स्थिरता ला सकता है।
बेंगलुरु: नवाचार और तकनीक का पावरहाउस
अहमदाबाद के बाद, चांसलर मर्ज़ का अगला पड़ाव भारत की ‘सिलिकॉन वैली’ बेंगलुरु है। यह यात्रा का वह हिस्सा है जो भविष्य को परिभाषित करेगा। यहाँ वे बॉश (Bosch) के स्मार्ट कैंपस और नैनो साइंस सेंटर का दौरा करेंगे। जर्मनी, जो अपनी ‘इंडस्ट्री 4.0’ के लिए जाना जाता है, को अपनी विनिर्माण क्षमता को डिजिटल बनाने के लिए भारत के सॉफ्टवेयर कौशल की आवश्यकता है।
बेंगलुरु में चर्चा का मुख्य विषय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सेमीकंडक्टर निर्माण, और स्टार्टअप इकोसिस्टम का एकीकरण होगा। एसएपी (SAP) और सीमेंस (Siemens) जैसी जर्मन कंपनियां पहले से ही बेंगलुरु में भारी निवेश कर रही हैं, और यह यात्रा इन संबंधों को ‘सह-सृजन’ (Co-creation) के स्तर पर ले जाएगी।
रक्षा सहयोग: ‘मेक इन इंडिया’ को जर्मन बल और प्रोजेक्ट-75I
इस यात्रा का सबसे चर्चित और रणनीतिक पहलू रक्षा सहयोग है। भारत अपनी नौसेना के आधुनिकीकरण के लिए प्रोजेक्ट-75I के तहत 6 उन्नत पनडुब्बियों का निर्माण करना चाहता है। जर्मन कंपनी थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स (TKMS) इस दौड़ में सबसे आगे है। उम्मीद की जा रही है कि चांसलर मर्ज़ की इस यात्रा के दौरान मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स (MDL) और TKMS के बीच अंतिम समझौतों पर मुहर लग सकती है।
यह सौदा लगभग 40,000 करोड़ रुपये (या $5-8 बिलियन अनुमानित) का हो सकता है। यह न केवल भारत की समुद्री सुरक्षा को मजबूत करेगा, बल्कि जर्मन रक्षा उद्योग के लिए भी एक बड़ी जीत होगी, जो अब तक रक्षा निर्यातों में कड़े नियमों का पालन करता था।
व्यापार और निवेश: 2030 का रोडमैप और एफटीए (FTA)
भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच मुक्त व्यापार समझौता (FTA) लंबे समय से लंबित है। Friedrich Merz, जो एक मुक्त बाजार समर्थक माने जाते हैं, इस समझौते को अंतिम रूप देने के लिए एक उत्प्रेरक का काम कर सकते हैं। वर्तमान में, जर्मनी यूरोप में भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है, जिसका द्विपक्षीय व्यापार 2025 में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था।
इस यात्रा का उद्देश्य इस व्यापार को दोगुना करना और आपूर्ति श्रृंखलाओं (Supply Chains) को चीन से हटाकर भारत में स्थानांतरित करना है। जर्मन ‘मिटेलस्टैंड’ (Mittelstand – लघु और मध्यम उद्यम) कंपनियां भारत में विनिर्माण के लिए उत्सुक हैं, और गुजरात जैसे राज्य उनके लिए आदर्श गंतव्य हैं।
हरित और सतत विकास साझेदारी (GSDP)
2022 में शुरू हुई India-German ‘ग्रीन एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट पार्टनरशिप’ को इस यात्रा से नई गति मिलेगी। जर्मनी ने 2030 तक भारत में जलवायु परियोजनाओं के लिए 10 बिलियन यूरो देने की प्रतिबद्धता जताई है। चर्चा का मुख्य केंद्र ‘ग्रीन हाइड्रोजन’ होगा। जर्मनी को अपनी भारी इंडस्ट्रीज के लिए स्वच्छ ऊर्जा की सख्त जरूरत है, और भारत के पास सूर्य और पवन ऊर्जा की प्रचुरता है जिससे वह कम लागत पर ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन कर सकता है।
दोनों देश एक ‘ग्रीन हाइड्रोजन टास्क फोर्स’ के तहत बुनियादी ढांचे और परिवहन मानकों पर काम कर रहे हैं, जो भविष्य में भारत को जर्मनी का प्रमुख ऊर्जा निर्यातक बना सकता है।
कुशल श्रम और प्रवासन: ‘फोकस ऑन इंडिया’ रणनीति
जर्मनी वर्तमान में एक गंभीर जनसांख्यिकीय संकट और कुशल श्रमिकों की कमी का सामना कर रहा है। इसके समाधान के लिए बर्लिन ने ‘फोकस ऑन इंडिया’ (Focus on India) रणनीति अपनाई है। चांसलर मर्ज़ इस यात्रा में वीजा प्रक्रियाओं को और सरल बनाने की घोषणा कर सकते हैं। हाल ही में वीजा प्रतीक्षा समय को 9 महीने से घटाकर 2 सप्ताह करने का निर्णय लिया गया था।
अब मुख्य जोर भारतीय इंजीनियरों, स्वास्थ्य कर्मियों और आईटी पेशेवरों के लिए डिग्री की मान्यता (Degree Recognition) को आसान बनाने पर है। ‘माइग्रेशन एंड मोबिलिटी पार्टनरशिप एग्रीमेंट’ (MMPA) के तहत, दोनों देश अवैध प्रवास को रोकते हुए वैध प्रतिभाओं के आवागमन को सुगम बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
भू-राजनीतिक समीकरण: चीन और इंडो-पैसिफिक
चांसलर मर्ज़ की यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में तनाव बढ़ रहा है। जर्मनी ने हाल ही में अपनी नौसेना को इस क्षेत्र में भेजा था, जो उसकी बढ़ती दिलचस्पी को दर्शाता है। भारत और जर्मनी दोनों ‘नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था’ (Rules-based International Order) के समर्थक हैं।
चीन की विस्तारवादी नीतियों के बीच, जर्मनी भारत को क्षेत्र में स्थिरता के एक प्रमुख स्तंभ के रूप में देखता है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधार के लिए भी दोनों देश G4 समूह के तहत एक-दूसरे का समर्थन करते हैं, और मर्ज़ इस मांग को और मुखरता से उठा सकते हैं।
शिक्षा और सांस्कृतिक आदान-प्रदान: भविष्य की नींव
जर्मनी भारतीय छात्रों के लिए सबसे पसंदीदा गैर-अंग्रेजी भाषी गंतव्य बन गया है। लगभग 50,000 से अधिक भारतीय छात्र वर्तमान में जर्मन विश्वविद्यालयों में अध्ययनरत हैं। इस यात्रा के दौरान दोनों देश संयुक्त डिग्री कार्यक्रमों और अनुसंधान सहयोग (Research Collaboration) को बढ़ाने पर जोर देंगे।
जर्मन अकादमिक विनिमय सेवा (DAAD) और भारत के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के बीच नए समझौतों पर हस्ताक्षर होने की संभावना है, जो विज्ञान, इंजीनियरिंग और मानविकी में शोध को बढ़ावा देंगे।
स्टार्टअप इकोसिस्टम का एकीकरण
बेंगलुरु की यात्रा का एक प्रमुख उद्देश्य दोनों देशों के स्टार्टअप इकोसिस्टम को जोड़ना है। ‘जर्मन इंडियन स्टार्टअप एक्सचेंज प्रोग्राम’ (GINSEP) को विस्तार दिया जा सकता है। बर्लिन और बेंगलुरु के बीच एक ‘स्टार्टअप कॉरिडोर’ बनाने की योजना है, जिससे भारतीय फिनटेक और हेल्थटेक स्टार्टअप्स को यूरोपीय बाजार तक सीधी पहुंच मिलेगी और जर्मन डीप-टेक स्टार्टअप्स को भारत के विशाल उपभोक्ता आधार का लाभ मिलेगा।
भविष्य की चुनौतियां और समाधान
हालाँकि संबंध मजबूत हैं, लेकिन कुछ चुनौतियां भी हैं। रूस-यूक्रेन संघर्ष पर भारत के तटस्थ रुख को लेकर जर्मनी में अतीत में कुछ असहजता रही है। हालाँकि, Friedrich Merz का दृष्टिकोण ओलाफ स्कोल्ज़ की तुलना में अधिक व्यावहारिक है। वे समझते हैं कि भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और ऊर्जा सुरक्षा की अपनी मजबूरियां हैं।
इस यात्रा में कोशिश यह होगी कि इन मतभेदों को दरकिनार करते हुए साझा हितों—जैसे व्यापार, सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन—पर ध्यान केंद्रित किया जाए। इसके अलावा, भारत-ईयू एफटीए में टैरिफ और डेटा सुरक्षा जैसे मुद्दों को सुलझाना भी एक चुनौती होगी।
एक सुदृढ़ और साझा भविष्य की ओर
चांसलर Friedrich Merz की जनवरी 2026 की भारत यात्रा, विशेष रूप से अहमदाबाद और बेंगलुरु का चयन, India-German संबंधों के परिपक्व होने का संकेत है। यह ‘खरीदार-विक्रेता’ के रिश्ते से आगे बढ़कर ‘सह-विकास और सह-उत्पादन’ की साझेदारी है। साझा लोकतांत्रिक मूल्य, तकनीकी पूरकता और भू-राजनीतिक हित दोनों देशों को एक-दूसरे के करीब ला रहे हैं।
जैसे-जैसे वैश्विक व्यवस्था बदल रही है, बर्लिन और नई दिल्ली (या कहें बर्लिन, अहमदाबाद और बेंगलुरु) के बीच का यह रणनीतिक संवाद न केवल दोनों देशों के लिए, बल्कि पूरे विश्व के लिए एक स्थिर प्रभाव (Stabilising Influence) साबित होगा।