
जब संकल्प मजबूत हो, तो असंभव भी संभव बन जाता है
डॉ. अर्जुन – एक दिव्यांग, लेकिन कभी पराजित नहीं। मेरा नाम सिर्फ मेरी पहचान नहीं है, बल्कि यह लाखों दिव्यांगजनों की उम्मीद, संघर्ष और आत्मबल की कहानी है।
नमस्कार दोस्तों, आज हम एक ऐसे दिव्यांग व्यक्ति से मिलने जा रहे हैं जिसने तमाम मुश्किलों को दरकिनार कर आगे बढ़ता रहा। जी हाँ, ये हैं दिव्यांग अर्जुन (कल्पित नाम)। जिनकी ज़िंदगी आसान नहीं रही। यह यात्रा काँटों से भरी, दर्द से लदी और संघर्षों से घिरी रही, लेकिन मेरा मनोबल और समाज के लिए कुछ करने का सपना हमेशा अडिग रहा। इस माध्यम से, मैं न केवल सच्ची जीवन कथा साझा कर रहा हूँ, बल्कि उन चुनौतियों और उम्मीदों को भी सामने ला रहा हूँ जिन्हें समाज अक्सर अनदेखा कर देता है। मेरा उद्देश्य है – प्रेरित करना, जोश जगाना और हर दिव्यांग के दिल तक पहुँचना।
दिव्यांग अर्जुन एक प्रेरणा दिव्यांग युवाओं की– दिव्यांगों की आवाज़, दिव्यांगों का भरोसा, मार्गदर्शक-
1. शुरुआत – जहाँ से उम्मीद ने जन्म लिया
1989: जब सबने कहा “नहीं हो सकता”, मैंने कहा “मैं कर सकता हूँ”।
ग्रामीण पृष्ठभूमि में जन्मा, जहाँ न सड़कें थीं, न सुविधाएँ।
मेरी पढ़ाई की पहली इच्छा का मज़ाक उड़ाया गया – “चल नहीं सकता तो पढ़ाई का क्या करेगा?”
लेकिन माँ की आँखों के आँसू और पिता की आँखों की आग ने मुझे जिद्दी बना दिया।
शारीरिक अक्षमता ने मेरे पैरों को बाँधा, लेकिन मेरे सपनों और इरादों को नहीं।
2. संघर्ष – हर दिन एक युद्ध था
दर्द, ताना और ठोकरें – लेकिन पीछे हटना नहीं सीखा
मेरे लिए विद्यालय जाना रोज़ की लड़ाई थी। न सड़कें थीं, न सहारा। गाँव से दूसरे गाँव स्कूल जाना मतलब हर रोज़ परीक्षा देना। लेकिन मैंने कभी स्कूल छोड़ने की नहीं सोची। कई बार बारिश में भीगते हुए, कभी धूप में जलते हुए, और कभी गिरते-पड़ते मैं स्कूल पहुँचा।
सहपाठियों के मज़ाक, शिक्षकों की उपेक्षा और सामाजिक भेदभाव – ये सब मेरे सफर के हिस्से बने। लेकिन इन सबके बीच एक चीज़ स्थिर रही – मेरी जिद। यह जिद ही थी जिसने मुझे गाँव के उस टूटे-फूटे स्कूल से भारत के शीर्ष तकनीकी संस्थानों तक पहुँचा दिया।
मैं कभी पीछे नहीं हटा।
सहपाठियों के मज़ाक, शिक्षकों की उपेक्षा, और समाजिक भेदभाव मेरे सफर का हिस्सा रहे। लेकिन मेरी जिद मुझे एक टूटी-फूटी पाठशाला से भारत के शीर्ष तकनीकी संस्थानों तक ले गई।
3. शिक्षा – सबसे बड़ी शक्ति, ज्ञान ही मेरा सबसे बड़ा सहारा।
IIT जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश पाना आसान नहीं था, और दिव्यांगों के लिए वहाँ रहना और भी कठिन था। ना रैंप थे, ना व्हीलचेयर की सुविधा, ना किसी भी प्रकार
ज्ञान ही है असली सहारा
मैंने दसवीं कक्षा से ही यह निश्चय कर लिया था कि मुझे अपने पैरों पर खड़ा होना है – भले ही मेरे असली पैर कमजोर हों, लेकिन आत्मनिर्भरता मेरा सपना था। मैंने आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने के लिए ट्यूशन देना शुरू किया।
मैंने पढ़ाया भी, सीखा भी। कमाया भी, खर्च भी किया – और ये सब बिना किसी मदद के। मेरी पूरी शिक्षा ‘Earned and Spent for Education and Social Work’ सिद्धांत पर आधारित रही।
मैंने डिप्लोमा इन इंजीनियरिंग, फिर B.Tech, और फिर IIT से M.Tech किया। और आखिर में, मैंने IIT से ही PhD पूरी की। इन सभी डिग्रियों के पीछे केवल मेरी मेहनत और मेरा संघर्ष था – किसी आरक्षण या विशेष सुविधा का लाभ नहीं।
👉 बिना किसी विशेष सुविधा या आरक्षण के, केवल मेहनत और आत्मविश्वास के बल पर।
4. IIT की हकीकत – सपनों में भी संघर्ष
PWD के लिए ना सहूलियत, ना संवेदना – फिर भी डटा रहा
IIT जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश पाना आसान नहीं था, और दिव्यांगों के लिए वहाँ रहना और भी कठिन था। ना रैंप थे, ना व्हीलचेयर की सुविधा, ना किसी भी प्रकार की मदद। जब बाकी छात्र कैंटीन और हॉस्टल में आराम से रहते, मैं अपने कमरे से क्लास तक पहुँचने में ही आधा समय गंवा देता था।
पर मैंने कभी शिकायत नहीं की। मैंने अपने कठिनाइयों को अपनी ताकत बना लिया। यह सोच आज मुझे लाखों दिव्यांगजनों के लिए एक मिसाल बनाती है।
5. समाज सेवा – दूसरों की मदद से अपनी आत्मा को शांति
1989 से मेरा मिशन: “दूसरों की मदद करोगे, तो खुद का दर्द भी कम होगा।”
जब मैं खुद संघर्ष कर रहा था, तभी मुझे यह एहसास हुआ कि मेरे जैसे कितने ही लोग और हैं जिन्हें ना मार्गदर्शन मिला, ना सहारा। तभी से मैंने निश्चय किया कि मैं सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि पूरे दिव्यांग समुदाय के लिए काम करूंगा।
मेरे प्रमुख सामाजिक कार्य:
· ट्राईसाइकिल, व्हीलचेयर, बैसाखी आदि का निःशुल्क वितरण
· शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति और करियर मार्गदर्शन
· दिव्यांग युवाओं के लिए प्रेरणादायक सेमिनार
· सरकारी योजनाओं की जानकारी और सहायता
· स्वरोजगार प्रशिक्षण और स्टार्टअप गाइडेंस
6. वार्षिक फेलोशिप – एक वेतन, एक भविष्य
16 वर्षों से हर साल एक पूरी सैलरी किसी दिव्यांग छात्र की पढ़ाई के लिए
हर साल मैं अपनी एक संपूर्ण मासिक आय एक जरूरतमंद दिव्यांग छात्र को समर्पित करता हूँ। यह सिर्फ दान नहीं, यह एक विश्वास है – कि शिक्षा से किसी का जीवन बदल सकता है। अब तक सैकड़ों छात्र इससे लाभान्वित हो चुके हैं, और आगे भी यह सिलसिला चलता रहेगा।
7. डिजिटल युग की शुरुआत – “Divyang Arjun” ब्लॉग
एक मंच, एक आंदोलन
अब जब भारत डिजिटल इंडिया बन रहा है, तो मैंने भी इस बदलाव को अपनाया। “Divyang Arjun – दिव्यांगों की आवाज़, दिव्यांगों का भरोसा” नामक यह ब्लॉग केवल एक वेबसाइट नहीं, बल्कि एक आंदोलन है।
ब्लॉग के उद्देश्य:
· मेरी प्रेरणादायक जीवन कथा को साझा करना
· सरकारी योजनाओं की विस्तृत जानकारी प्रदान करना
· दिव्यांगों के लिए उपयोगी वीडियो, लेख और इंटरव्यू
· सामाजिक कार्यों की रिपोर्टिंग
· दिव्यांगों की सच्ची कहानियों को प्रकाशित करना।
8. असली चुनौतियाँ – जिनसे आज भी दिव्यांग जूझ रहे हैं
- शिक्षा तक पहुँच की कमी
- रोजगार के अवसरों की अनुपलब्धता
- सरकारी योजनाओं का सही लाभ न मिलना
- IIT जैसे संस्थानों में सहूलियतों की कमी
- समाज की उपेक्षा और दया की नजर
9. भविष्य की योजनाएँ – उम्मीद की नई रोशनी
· राष्ट्रीय दिव्यांग नेटवर्क: एक ऐसा मंच जहाँ हर राज्य के दिव्यांग आपस में जुड़ सकें
· ऑनलाइन कोर्सेज: दिव्यांग युवाओं के लिए मुफ्त कौशल विकास
· रोजगार मेले: कंपनियों और दिव्यांग प्रतिभाओं को जोड़ने का प्रयास
· सहायक उपकरण केंद्र: उपकरण वितरण के लिए केंद्रों की स्थापना
· प्रेरणादायक स्टोरी सीरीज: सच्ची कहानियों के माध्यम से जागरूकता
10. समाज से मेरा अनुरोध – अब वक्त है बदलाव का
मैं सभी नागरिकों, संगठनों और नीति-निर्माताओं से अपील करता हूँ:
· दिव्यांगों को दया नहीं, अधिकार दें
· रोजगार और शिक्षा में समान अवसर सुनिश्चित करें
· सरकारी योजनाओं का सरल और डिजिटल पहुँच बनाएं
· हर संस्थान में दिव्यांगों के लिए बुनियादी सुविधाएं अनिवार्य करें
· “इन्क्लूजन” को केवल नीति में नहीं, व्यवहार में अपनाएं
10. आप कैसे जुड़ सकते हैं?
· ब्लॉग को पढ़ें और दूसरों से शेयर करें
· अपने आस-पास के दिव्यांगों को जागरूक करें
· स्वयंसेवक बनें और इस आंदोलन का हिस्सा बनें
· आर्थिक सहायता या करियर गाइडेंस में सहयोग करें
· सोशल मीडिया पर #DivyangArjun 1
मैं हूँ दिव्यांग अर्जुन – एक नाम, एक आंदोलन
मेरा जीवन संदेश है:
👉 “कमज़ोरी नहीं, संकल्प मायने रखता है।”
आज मेरा संघर्ष केवल मेरी कहानी नहीं है, बल्कि यह हर दिव्यांग की प्रेरणा है।
मेरा ब्लॉग, मेरा मिशन और मेरा जीवन – सबका एक ही उद्देश्य है:
“दिव्यांगों की आवाज़ बनना और उनके सपनों को उड़ान देना।”
आज मैं चल नहीं सकता, लेकिन मैंने कभी रुकना नहीं सीखा। मेरे जीवन का हर दिन एक संघर्ष रहा है, लेकिन हर सुबह एक नई आशा लेकर आई। अगर मैंने अपने सीमित संसाधनों और असहनीय कठिनाइयों में यह कर दिखाया, तो आप भी कर सकते हैं।
आइए, हम सब मिलकर एक ऐसा भारत बनाएं जहाँ किसी को उसकी शारीरिक स्थिति से नहीं, बल्कि उसके आत्मबल और प्रतिभा से पहचाना जाए।
आपका साथी,
DIVYANG DR. ARJUN (Dr. Singh) “एक दिव्यांग समाजसेवी – 1989 से अब तक” Tagline: ‘दिव्यांगों की आवाज़, दिव्यांगों का भरोसा’
About Us
DISHA (Divyang Identity Safety Help Association)
DISHA (Divyang Identity Safety Help Association) is a place to help Divyangjan, Orphans, Poors, and Senior Citizen, by offering them Physical, Mental, and Financial support i.e. Scholarship for PWD education, Guidance, Education support, Consultancy, Job-Business support, Aids (Caliper, artificial limbs, tricycle, wheelchair, Baishakhi, hearing aids, electric scooty, money & referral for treatment/operation etc.) required for their smooth and comfortable life. Prof.(Dr.) Pavitra Singh PhD(IIT), B.Tech, M.Tech (IIT), DM