रेलवे और नौकरियों में दिव्यांगों से 'महाछल' – पुलिस की दादागिरी और फर्जीवाड़े का पर्दाफाश
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7 कड़वे सच 2025: रेलवे और नौकरियों में दिव्यांगों से ‘महाछल’ – पुलिस की दादागिरी और फर्जीवाड़े का पर्दाफाश

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रेलवे और नौकरियों में दिव्यांगों से ‘महाछल‘ – दादागिरी और फर्जीवाड़े

Fake Disability Certificate Scam
रेलवे और नौकरियों में दिव्यांगों से ‘महाछल’ – पुलिस की दादागिरी और फर्जीवाड़े का पर्दाफाश

दिव्यांग शब्द का सम्मान और जमीनी हकीकत का कड़वा सच

भारत में ‘विकलांग’ शब्द को हटाकर ‘दिव्यांग’ (दिव्य अंग वाला) कर दिया गया, ताकि समाज में उन्हें सम्मान मिल सके। सरकार की मंशा सराहनीय थी, लेकिन 2025 में जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। आज भी देश का दिव्यांग समुदाय अपनी बुनियादी जरूरतों, सम्मान और अधिकारों के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहा है।

चाहे वह भारतीय रेलवे की अव्यवस्था हो, सरकारी नौकरियों में फर्जी प्रमाण पत्रों (Fake Disability Certificates) के जरिए हकमारी हो, या फिर खुद दिव्यांग आयोग (Divyang Ayog) की उदासीनता—हर जगह दिव्यांगों के साथ ‘छल’ हो रहा है। यह लेख उन सभी कड़वे सचों को उजागर करेगा जो अक्सर मुख्यधारा की मीडिया से गायब रहते हैं।

1. भारतीय रेलवे: ‘सफर’ नहीं, दिव्यांगों के लिए ‘सफरिंग’ (Suffering)

भारतीय रेलवे, जिसे देश की जीवनरेखा कहा जाता है, दिव्यांगों के लिए अक्सर एक बुरे सपने जैसा होता है। कहने को तो रेलवे में दिव्यांगों के लिए विशेष कोच (SLRD) और आरक्षित सीटें होती हैं, लेकिन वास्तविकता रोंगटे खड़े करने वाली है। सबसे बड़ा मुद्दा है—सीटों की अत्यंत सीमित संख्या। लंबी दूरी की ट्रेनों के स्लीपर कोच में मात्र 2 या 4 सीटें ही दिव्यांगों के लिए आरक्षित होती हैं।

एक ट्रेन जिसमें हजारों यात्री सफर करते हैं, वहां केवल मुट्ठी भर सीटें क्या ऊंट के मुंह में जीरा नहीं हैं?

पूरे किराए की वसूली और मानवीय संवेदनाओं की हत्या

हाल के वर्षों में, विशेषकर कोविड के बाद से, कई रियायतों (Concessions) में बदलाव किए गए हैं। दिव्यांगों को मिलने वाली रियायतें बहाल तो हैं, लेकिन प्रक्रिया को इतना जटिल (Online UDID verification) बना दिया गया है कि ग्रामीण भारत का एक बड़ा हिस्सा इसका लाभ ही नहीं ले पाता।

विडंबना यह है कि जब आरक्षित कोटे की सीटें भर जाती हैं, तो दिव्यांग यात्री को सामान्य टिकट लेकर सफर करना पड़ता है। ऐसे में रेलवे उनसे पूरा किराया वसूलता है, लेकिन सुविधा के नाम पर उन्हें सामान्य डिब्बे की भीड़ में धकेल दिया जाता है, जहां उनके लिए खड़ा होना भी मुश्किल होता है। यह केवल व्यापार नहीं, बल्कि एक अमानवीय कृत्य है।

रेलवे पास और आरक्षण के लिए दिव्यांगों का अंतहीन संघर्ष।

दिव्यांग कोच में पुलिस और स्टाफ की अवैध घुसपैठ

यह एक ‘ओपन सीक्रेट’ है जिसे हर दिव्यांग यात्री जानता है। ट्रेनों में दिव्यांगजन के लिए आरक्षित कोच (Disability Coach) अक्सर पुलिसवालों, रेलवे स्टाफ और अनाधिकृत यात्रियों का अड्डा बन जाते हैं। नियम के अनुसार, इस कोच में केवल दिव्यांग और उनके सहायक (Escort) ही यात्रा कर सकते हैं। लेकिन असलियत में, वर्दी के रोब में पुलिसकर्मी पूरी बर्थ पर कब्जा जमा लेते हैं।

यदि कोई दिव्यांग यात्री इसका विरोध करता है, तो उसके साथ अभद्रता (Harassment) की जाती है, डराया-धमकाया जाता है, और कई बार तो उन्हें कोच से बाहर जाने के लिए मजबूर कर दिया जाता है। RPF (रेलवे सुरक्षा बल) जिसकी जिम्मेदारी सुरक्षा की है, वही कई बार भक्षक बन जाती है।

आरक्षित डिब्बे में पुलिस और स्टाफ का अवैध कब्जा: एक आम दृश्य।

2. सरकारी नौकरियों में ‘डाका’: फर्जी दस्तावेजों का खेल

दिव्यांगों के संघर्ष की दूसरी सबसे बड़ी रणभूमि सरकारी नौकरियां हैं। संविधान और कानून (RPWD Act 2016) ने उन्हें सरकारी नौकरियों में 4% आरक्षण दिया है, ताकि वे समाज की मुख्यधारा में शामिल हो सकें। लेकिन सामान्य वर्ग (UR) के कुछ भ्रष्ट और अवसरवादी लोगों ने इसे भी लूट का जरिया बना लिया है। फर्जी दिव्यांगता प्रमाण पत्र (Fake Disability Certificate Scam) बनवाकर, पूरी तरह स्वस्थ लोग दिव्यांगों का हक मार रहे हैं।

राजस्थान का ‘फर्जीवाड़ा’ मॉडल और UPSC स्कैंडल

हाल ही में राजस्थान (Among India) और अन्य राज्यों से आई खबरें चौंकाने वाली हैं। SOG (Special Operations Group) की जांच में पाया गया कि कई शिक्षक और अधिकारी, जो पूरी तरह स्वस्थ थे, ‘दृष्टिबाधित’ या ‘मूक-बधिर’ होने का फर्जी सर्टिफिकेट बनवाकर नौकरी कर रहे थे।

उन्होंने असली दिव्यांगों की सीटें छीन लीं। यह केवल एक राज्य की बात नहीं है; UPSC (INDIA LEVEL) जैसी प्रतिष्ठित परीक्षाओं में भी ऐसे आरोप लगे हैं जहां मामूली या फर्जी दिव्यांगता के आधार पर कोटे का लाभ उठाया गया। यह असली हकदारों के पेट पर लात मारने जैसा है।

मेडिकल बोर्ड और दलालों का गठजोड़

यह फर्जीवाड़ा बिना सिस्टम की मिलीभगत के संभव नहीं है। कुछ भ्रष्ट डॉक्टर्स और मेडिकल बोर्ड, चंद पैसों की खातिर स्वस्थ व्यक्ति को 40% या उससे अधिक का दिव्यांगता प्रमाण पत्र जारी कर देते हैं। एक तरफ जहां एक असली दिव्यांग अपने UDID कार्ड के लिए दफ्तरों के चक्कर काटता है और उसे ‘अपात्र’ बताकर भगा दिया जाता है, वहीं दूसरी तरफ पैसे के दम पर फर्जी प्रमाण पत्र घर बैठे बन जाते हैं। यह भ्रष्टाचार दिव्यांगों के भविष्य को दीमक की तरह चाट रहा है।

सरकारी नौकरियों में सामान्य वर्ग द्वारा फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र का खेल।

3. दिव्यांग आयोग (Divyang Ayog): रक्षक या मूकदर्शक?

जब दिव्यांगों के अधिकारों का हनन होता है, तो उनकी एकमात्र उम्मीद ‘दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग’ और ‘मुख्य आयुक्त (दिव्यांगजन)’ (CCPD) से होती है। लेकिन दुर्भाग्यवश, यह संस्थाएं भी अब ‘दंतहीन शेर’ (Toothless Tiger) साबित हो रही हैं।

आयोग की उदासीनता और ‘विपरीत पार्टी’ को सहयोग

दिव्यांगों की शिकायतें वर्षों तक आयोग की फाइलों में धूल फांकती रहती हैं। कई मामलों में देखा गया है कि जब कोई दिव्यांग किसी सरकारी विभाग या अधिकारी के खिलाफ शिकायत करता है, तो आयोग पीड़ित को न्याय दिलाने के बजाय आरोपी पक्ष (Opposite Party) का ही बचाव करता नजर आता है या मामले को केवल ‘सिफारिश’ (Recommendation) देकर रफा-दफा कर देता है।

उच्च न्यायालयों ने भी कई बार टिप्पणी की है कि आयोग के आदेश बाध्यकारी (Binding) नहीं माने जाते, जिससे अधिकारी इनके आदेशों को गंभीरता से नहीं लेते। यह संस्थागत उदासीनता दिव्यांगों के मनोबल को तोड़ने का काम करती है।

4. प्रमुख सरकारी योजनाएं (2025): उम्मीद की किरण या कागजी शेर?

तमाम अंधेरों के बीच, सरकार की कुछ योजनाएं हैं जो यदि सही ढंग से लागू हों, तो जीवन बदल सकती हैं। आइए 2025 में प्रासंगिक कुछ प्रमुख योजनाओं पर एक तकनीकी नज़र डालें।

UDID कार्ड (Swavlamban Card)

यह दिव्यांगों के लिए ‘आधार कार्ड’ जैसा है। इसका उद्देश्य पूरे देश में एक समान पहचान पत्र प्रदान करना है। अब रेलवे पास, बस पास और नौकरियों में आरक्षण के लिए अलग-अलग दस्तावेजों की जगह केवल UDID ही काफी होना चाहिए। हालांकि, इसे बनवाने में आ रही मेडिकल बोर्ड की लेटलतीफी एक बड़ी चुनौती है।

ADIP योजना (सहायक उपकरण)

इस योजना के तहत सरकार जरूरतमंद दिव्यांगों को व्हीलचेयर, ट्राईसाइकिल, बैसाखी, और सुनने की मशीनें (Hearing Aids) मुफ्त या रियायती दरों पर उपलब्ध कराती है। ALIMCO जैसी संस्थाएं इसके कार्यान्वयन में मुख्य भूमिका निभाती हैं। आधुनिक तकनीक जैसे मोटराइज्ड ट्राईसाइकिल अब इस योजना का मुख्य आकर्षण हैं।

UDID कार्ड: डिजिटल पहचान और सरकारी सुविधाओं की चाबी।

सुगम्य भारत अभियान (Accessible India Campaign)

इसका लक्ष्य सरकारी इमारतों, रेलवे स्टेशनों और वेबसाइटों को दिव्यांगों के लिए सुलभ बनाना है। 2025 में भी, कई सरकारी दफ्तरों में रैंप (Ramp) नहीं हैं या इतने खड़े हैं कि उन पर व्हीलचेयर चढ़ाना जान जोखिम में डालने जैसा है। यह अभियान कागजों पर सफल है, लेकिन धरातल पर अभी मीलों का सफर बाकी है।

5. दिव्यांगों के साथ सामाजिक छल: ‘जो करना है कर लो’ वाली मानसिकता

केवल सरकार या पुलिस ही नहीं, आम समाज भी दिव्यांगों के प्रति संवेदनहीन हो गया है। बस या ट्रेन में आरक्षित सीट पर बैठे स्वस्थ युवा से जब सीट मांगी जाती है, तो अक्सर जवाब मिलता है—’अगली में चले जाओ’ या ‘जो करना है कर लो’।

यह सामाजिक व्यवहार (Social Apathy) किसी भी कानून से ज्यादा दुखदाई है। दिव्यांगजन दया नहीं, अधिकार और सहभागिता मांगते हैं। लेकिन समाज उन्हें ‘बेचारा’ मानकर या तो दया दिखाता है या फिर उनके अधिकारों को कुचल देता है।

6. तकनीकी समाधान और आगे की राह

समस्याएं गंभीर हैं, लेकिन समाधान संभव हैं। यदि हम तकनीक और इच्छाशक्ति का सही उपयोग करें, तो तस्वीर बदल सकती है। this is the Special Operations Group, and Harassment

बायोमेट्रिक वेकेंट सीट डिटेक्शन

रेलवे को दिव्यांग कोच में बायोमेट्रिक या फेस-रिकग्निशन सिस्टम लगाना चाहिए। यदि कोई अनाधिकृत व्यक्ति (पुलिस या स्टाफ) वहां बैठता है, तो अलार्म सिस्टम कंट्रोल रूम को सूचित करे। तकनीक का उपयोग कर पुलिस की दादागिरी पर लगाम लगाई जा सकती है।

फर्जी प्रमाण पत्रों की डिजिटल ऑडिटिंग

सरकारी नौकरियों में चयनित सभी दिव्यांग उम्मीदवारों का केंद्र स्तर पर एक स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड द्वारा ‘क्रॉस-वेरिफिकेशन’ अनिवार्य होना चाहिए। जिनका सर्टिफिकेट फर्जी निकले, उन पर न केवल नौकरी से बर्खास्तगी की कार्रवाई हो, बल्कि धोखाधड़ी का आपराधिक मुकदमा भी चले और जारी करने वाले डॉक्टर का लाइसेंस रद्द हो।

अब ‘याचना’ नहीं, ‘रण’ होगा

2025 का भारत ‘विश्वगुरु’ बनने की ओर अग्रसर है, लेकिन अपने ही करोड़ों दिव्यांग नागरिकों को पीछे छोड़कर यह सपना पूरा नहीं हो सकता। रेलवे में 2 सीटों की भीख नहीं, गरिमापूर्ण यात्रा का अधिकार चाहिए। नौकरियों में फर्जीवाड़े की जांच के लिए केवल कमेटियां नहीं, सख्त सजा चाहिए। और सबसे महत्वपूर्ण, दिव्यांग आयोग को एक ‘पोस्ट ऑफिस’ से बदलकर एक सशक्त ‘न्यायालय’ का रूप देना होगा।

दिव्यांगजन अब चुप नहीं बैठेंगे। जैसा कि राष्ट्रकवि दिनकर ने कहा था—’याचना नहीं, अब रण होगा’। यह संघर्ष तब तक जारी रहेगा जब तक ‘दिव्यांग’ शब्द का असली सम्मान धरातल पर नहीं उतरता। Harassment,

Disclaimer

This investigative report titled “रेलवे और नौकरियों में दिव्यांगों से ‘महाछल’ – पुलिस की दादागिरी और फर्जीवाड़े का पर्दाफाश” is published with the following disclaimers:

  1. Journalistic Purpose: This article is prepared for journalistic, awareness, and public interest purposes. It aims to highlight systemic issues faced by persons with disabilities in India, based on documented cases, reported incidents, and ground-level feedback.

  2. Sources of Information: The content is compiled from:

    • Analysis of public documents, government reports, and Right to Information (RTI) replies.

    • Examination of reported cases in various media outlets.

    • Collation of testimonials and experiences shared by persons with disabilities and activists (names changed where requested for privacy).

    • Reference to provisions under The Rights of Persons with Disabilities Act, 2016, and official government schemes.

  3. Allegations and Claims: The article contains allegations of corruption, negligence, and systemic failure. These are presented as critical perspectives on existing challenges. Specific references to government bodies like the Railways, Police, and the Office of the Chief Commissioner for Persons with Disabilities (CCPD) are made in the context of discussing their mandated roles and reported gaps in implementation.

  4. No Malicious Intent: There is no intention to malign any specific individual, uniformed service (like RPF/GRP), or government institution as a whole. The critique is directed at systemic loopholes, alleged individual misconduct within the system, and institutional apathy that fails the constitutional rights of citizens with disabilities.

  5. Fair Comment: The views expressed regarding policy implementation, social attitudes, and institutional response constitute fair comment in the public interest on matters of significant public concern.

  6. Accuracy & Corrections: While due diligence has been exercised in fact-checking, we acknowledge the dynamic nature of administrative processes. We are committed to accuracy and will issue prompt corrections if any specific factual inaccuracies are brought to our notice with verified documentation.

  7. Trigger Warning: The article discusses themes of discrimination, harassment, and injustice, which some readers may find distressing.

  8. Call to Action: This report is intended to foster constructive dialogue, urge accountability, and empower citizens and authorities to work towards inclusive solutions. It aligns with the spirit of the Sustainable Development Goals (SDGs), particularly SDG 10 (Reduced Inequalities) and SDG 16 (Peace, Justice, and Strong Institutions).

The publication of this article is protected under the constitutional principles of freedom of speech and expression (Article 19(1)(a) of the Constitution of India), with the responsibility to use this freedom for promoting social justice and holding power to account.

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