दिव्यांग अर्जुन: IIT PhD डॉ. सिंह की 10 अनदेखी संघर्ष गाथाएं और 2026 का विजन
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दिव्यांग अर्जुन: IIT PhD डॉ. सिंह की 10 अनदेखी संघर्ष गाथाएं और 2026 का विजन

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दिव्यांग अर्जुन: IIT PhD डॉ. सिंह की 10 अनदेखी संघर्ष गाथाएं और 2026 का विजन

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दिव्यांग अर्जुन: एक परिचय जो परिचय का मोहताज नहीं

जब हौसले बुलंद हों, तो पहाड़ भी राई के समान लगने लगते हैं। यह कहावत हम सबने सुनी है, लेकिन इसे सच कर दिखाया है डॉ. पवित्र सिंह ने, जिन्हें दुनिया आज ‘दिव्यांग अर्जुन’ (Divyang Arjun) के नाम से जानती है। दिशा मंच (DISHA MUNCH) के संस्थापक और एक IIT से पीएचडी धारक, डॉ. सिंह की कहानी केवल एक व्यक्ति की सफलता की कहानी नहीं है; यह भारत के करोड़ों दिव्यांगजनों के संघर्ष, अपमान, जिजीविषा और अंततः विजय की गाथा है।

आज के इस विस्तृत लेख में, हम न केवल डॉ. सिंह के जीवन के उन पहलुओं को उजागर करेंगे जो अब तक अनछुए थे, बल्कि हम भारत में दिव्यांगता की स्थिति, सरकारी योजनाओं, और समाज की भूमिका पर भी एक तकनीकी और भावनात्मक विश्लेषण करेंगे। यह लेख उन सभी के लिए है जो जीवन में हार मान चुके हैं, या जो समाज सेवा के माध्यम से बदलाव लाना चाहते हैं।

1. 1989: एक संघर्षपूर्ण शुरुआत और ग्रामीण भारत की चुनौतियाँ

डॉ. सिंह का जन्म 1989 में एक ऐसे ग्रामीण परिवेश में हुआ जहाँ बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव था। उस समय भारत में ‘दिव्यांग’ शब्द प्रचलन में नहीं था; लोग ‘विकलांग’ या उससे भी अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करते थे। एक शारीरिक रूप से अक्षम बच्चे का जन्म परिवार के लिए चिंता का विषय माना जाता था। सड़कें कच्ची थीं, स्कूल दूर थे, और आवागमन के साधन न के बराबर थे।

1989: संघर्ष की शुरुआत – जब स्कूल जाने के लिए हर दिन एक युद्ध जैसा था।

जब डॉ. सिंह ने स्कूल जाने की इच्छा जाहिर की, तो समाज की पहली प्रतिक्रिया उपहास की थी। “यह क्या करेगा पढ़ कर?” जैसे ताने उनके माता-पिता को सुनने पड़े। लेकिन उनकी माँ के आँसू और पिता के दृढ़ संकल्प ने उन्हें टूटने नहीं दिया। बरसात के दिनों में कीचड़ में फँसी बैसाखियाँ और गिरते-पड़ते स्कूल पहुँचना उनकी दिनचर्या बन गई थी। यह वह दौर था जब न तो ‘सर्व शिक्षा अभियान’ का इतना जोर था और न ही स्कूलों में रैंप (Ramp) की सुविधा होती थी।

2. शिक्षा को बनाया हथियार: डिप्लोमा से IIT PhD तक का सफर

शारीरिक सीमाओं को मानसिक उड़ान से कैसे हराया जाता है, यह डॉ. सिंह ने अपनी शिक्षा के दौरान साबित किया। ग्रामीण स्कूल से निकलकर उन्होंने इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया। यह सफर आसान नहीं था। लैब में खड़े होकर प्रैक्टिकल करना, भारी मशीनों के बीच काम करना—एक दिव्यांग छात्र के लिए यह सब दोहरी चुनौती थी। लेकिन उन्होंने न केवल इसे पूरा किया बल्कि बी.टेक (B.Tech) में भी उत्कृष्ट प्रदर्शन किया।

असली परीक्षा तब शुरू हुई जब उन्होंने भारत के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) में प्रवेश का सपना देखा। IIT में एम.टेक (M.Tech) और फिर पीएचडी (PhD) करना सामान्य छात्रों के लिए भी लोहे के चने चबाने जैसा होता है। डॉ. सिंह के लिए यह चुनौती कई गुना बड़ी थी। IIT का कैंपस बड़ा होता है, हॉस्टल से क्लासरूम की दूरी, लाइब्रेरी की सीढ़ियाँ, और समय का दबाव—इन सबने उनकी परीक्षा ली।

IIT का सपना: शारीरिक बाधाओं को तोड़कर तकनीकी शिक्षा के शिखर तक।

लेकिन जैसा कि वे कहते हैं, “शिक्षा ही वह शेरनी का दूध है जो पीता है वही दहाड़ता है।” उन्होंने अपनी विद्वता और शोध कार्यों से यह साबित कर दिया कि प्रतिभा किसी शारीरिक क्षमता की मोहताज नहीं होती। उन्होंने बिना किसी आरक्षण या विशेष दया की भीख मांगे, अपनी योग्यता के बल पर अपनी डिग्रियां हासिल कीं।

3. दिशा मंच (DISHA MUNCH): एक आंदोलन का उदय

अपनी शिक्षा के दौरान और उसके बाद, डॉ. सिंह ने महसूस किया कि उनकी सफलता व्यक्तिगत हो सकती है, लेकिन उनकी पीड़ा सामूहिक है। लाखों दिव्यांग आज भी जानकारी और संसाधनों के अभाव में घुट-घुट कर जी रहे हैं। इसी विचार ने जन्म दिया ‘दिशा’ (DISHA – Divyang Identity Safety Help Association) को।

दिशा मंच का उद्देश्य केवल सहानुभूति जताना नहीं है, बल्कि ठोस मदद पहुँचाना है। यह मंच दिव्यांगजनों, अनाथ बच्चों, गरीबों और वरिष्ठ नागरिकों के लिए एक आश्रय स्थल बन गया है। यहाँ शारीरिक, मानसिक और आर्थिक—तीनों प्रकार की सहायता प्रदान की जाती है। चाहे वह शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति हो, या व्यवसाय शुरू करने के लिए मार्गदर्शन, दिशा मंच हर कदम पर साथ खड़ा रहता है।

दिशा मंच (DISHA MUNCH): सहायता केवल दान नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी है।

4. ‘Earn and Spend’ का अनूठा दर्शन

समाज सेवा के क्षेत्र में अक्सर हम देखते हैं कि संस्थाएं चंदे (Donation) पर निर्भर रहती हैं। लेकिन डॉ. सिंह का मॉडल इससे अलग और प्रेरणादायक है। उन्होंने अपनी शिक्षा और करियर के दौरान ‘Earned and Spent for Education and Social Work’ के सिद्धांत का पालन किया। इसका अर्थ है—खुद कमाना और उस कमाई का एक बड़ा हिस्सा समाज के लिए खर्च करना।

यह दर्शन दिव्यांगों को ‘आत्मनिर्भर’ बनने की प्रेरणा देता है। डॉ. सिंह का मानना है कि जब एक दिव्यांग व्यक्ति खुद कमाता है, तो उसका आत्मसम्मान जागृत होता है, और जब वह दूसरों की मदद करता है, तो उसका जीवन सार्थक हो जाता है। यह ‘दान लेने वाले’ से ‘दान देने वाले’ बनने की यात्रा है।

वार्षिक फेलोशिप: एक वेतन, एक भविष्य

पिछले 16 वर्षों से, डॉ. सिंह हर साल अपनी एक पूरी महीने की सैलरी (वेतन) किसी जरूरतमंद दिव्यांग छात्र की शिक्षा के लिए समर्पित करते हैं। यह एक प्रतीकात्मक कार्य नहीं, बल्कि एक ठोस आर्थिक मदद है जिसने अब तक सैकड़ों छात्रों के भविष्य को संवारा है। इस पहल ने कई युवाओं को इंजीनियर, डॉक्टर और शिक्षक बनने में मदद की है।

5. डिजिटल युग में ‘दिव्यांग अर्जुन’ ब्लॉग

21वीं सदी डिजिटल क्रांति की सदी है। डॉ. सिंह ने समय की नब्ज को पहचानते हुए ‘Divyang Arjun’ ब्लॉग और पोर्टल की शुरुआत की। यह ब्लॉग केवल उनकी आत्मकथा नहीं है, बल्कि सूचनाओं का एक भंडार है। यहाँ सरकारी योजनाओं, नई तकनीकों, और प्रेरणादायक कहानियों का संग्रह मिलता है।

डिजिटल क्रांति: ब्लॉग के माध्यम से लाखों दिव्यांगों को जोड़ने का प्रयास।

इस ब्लॉग के माध्यम से, वे देश के कोने-कोने में बैठे दिव्यांगों से जुड़ते हैं। जो जानकारी पहले सरकारी दफ्तरों की धूल फांकने पर भी नहीं मिलती थी, वह अब एक क्लिक पर उपलब्ध है। यह ‘डिजिटल इंडिया’ के सपने को दिव्यांगों के लिए साकार करने जैसा है।

6. भारत में दिव्यांगजन: सांख्यिकी और वास्तविकता (2025 संदर्भ)

2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में लगभग 2.68 करोड़ लोग दिव्यांग थे, लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और हालिया 2024-25 के अनुमानों के अनुसार, यह संख्या इससे कहीं अधिक, लगभग 10-15% जनसंख्या हो सकती है। इतनी बड़ी आबादी होने के बावजूद, मुख्यधारा में इनका प्रतिनिधित्व न के बराबर है।

सबसे बड़ी चुनौतियाँ जो आज भी विद्यमान हैं:

1. **सुगम्यता (Accessibility):** आज भी 90% से अधिक सार्वजनिक इमारतें पूरी तरह से व्हीलचेयर-सुलभ नहीं हैं। 2. **शिक्षा:** विशेष शिक्षकों (Special Educators) की भारी कमी है। 3. **रोजगार:** कॉर्पोरेट जगत में ‘इनक्लूजन’ (Inclusion) की बातें तो होती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर भर्ती प्रक्रिया में भेदभाव होता है।

7. आपके अधिकार: RPwD Act 2016 की ताकत

हर दिव्यांग युवा को अपने कानूनी अधिकारों के बारे में पता होना चाहिए। ‘दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016’ (Rights of Persons with Disabilities Act, 2016) एक मील का पत्थर है। दिशा मंच इस अधिनियम के प्रति जागरूकता फैलाने का काम करता है।

इस कानून की मुख्य बातें:

• **दिव्यांगता की श्रेणियाँ:** पहले 7 प्रकार की विकलांगता थी, जिसे बढ़ाकर अब 21 कर दिया गया है (जिसमें एसिड अटैक विक्टिम्स, थैलेसीमिया, और लर्निंग डिसेबिलिटी भी शामिल हैं)। • **आरक्षण:** सरकारी नौकरियों में आरक्षण 3% से बढ़ाकर 4% किया गया है। उच्च शिक्षा में यह 5% है। • **दंड का प्रावधान:** दिव्यांगों के साथ भेदभाव या उनका अपमान करना अब एक दंडनीय अपराध है।

8. 5 सरकारी योजनाएं जो आपका जीवन बदल सकती हैं

दिशा मंच के माध्यम से डॉ. सिंह लगातार इन योजनाओं का प्रचार करते हैं। यहाँ शीर्ष 5 योजनाएं हैं जिनका लाभ हर दिव्यांग को उठाना चाहिए:

A. स्वावलंबन कार्ड (UDID Card)

यह ‘यूनिक डिसेबिलिटी आईडी’ है। इसे बनवाने के बाद आपको अलग-अलग दस्तावेजों को साथ रखने की जरूरत नहीं पड़ती। यह पूरे भारत में मान्य है। आप इसे ऑनलाइन घर बैठे बनवा सकते हैं।

B. ADIP योजना (ADIP Scheme)

इस योजना के तहत, जरूरतमंद दिव्यांगों को सहायक उपकरण (जैसे ट्राइसाइकिल, व्हीलचेयर, बैसाखी, सुनने की मशीन) या तो मुफ्त दिए जाते हैं या भारी सब्सिडी पर। दिशा मंच अक्सर इसके तहत वितरण शिविर आयोजित करता है।

C. सुगम्य भारत अभियान (Accessible India Campaign)

यह अभियान सरकारी इमारतों, परिवहन और वेबसाइटों को दिव्यांगों के लिए सुलभ बनाने पर केंद्रित है। यदि आप किसी सरकारी दफ्तर में रैंप नहीं पाते हैं, तो आप इस अभियान के तहत शिकायत दर्ज करा सकते हैं।

D. NHFDC लोन योजना

राष्ट्रीय दिव्यांगजन वित्त और विकास निगम (NHFDC) स्वरोजगार के लिए बहुत कम ब्याज दर पर ऋण (Loan) प्रदान करता है। अगर आप अपना स्टार्टअप शुरू करना चाहते हैं, तो यह आपके लिए है।

9. भविष्य की योजनाएँ: उम्मीद की नई रोशनी (Vision 2026)

डॉ. सिंह और दिशा मंच का विजन 2026 के लिए और भी व्यापक है। उनकी भविष्य की योजनाओं में शामिल हैं:

1. **राष्ट्रीय दिव्यांग नेटवर्क:** एक ऐसा डिजिटल मंच जहाँ हर राज्य के दिव्यांग आपस में जुड़ सकें, अनुभव साझा कर सकें और विवाह/रोजगार के लिए नेटवर्क बना सकें। 2. **कौशल विकास केंद्र:** केवल डिग्री काफी नहीं है। दिशा मंच का लक्ष्य है दिव्यांग युवाओं को कोडिंग, डिजिटल मार्केटिंग, और AI जैसे आधुनिक कौशलों में प्रशिक्षित करना। 3. **सहायक उपकरण बैंक:** हर जिले में एक ऐसा केंद्र जहाँ पुराने उपकरण जमा किए जा सकें और नए जरूरतमंदों को दिए जा सकें (Recycling of Aids)।

भविष्य का भारत: जहाँ ‘दिव्यांग’ होना बाधा नहीं, बल्कि एक अलग पहचान होगी।

10. समाज से अनुरोध: दया नहीं, अवसर दें

इस लेख के माध्यम से हम समाज के हर वर्ग से एक अपील करना चाहते हैं। जब आप किसी दिव्यांग को देखें, तो उस पर दया न करें, न ही उसे बेचारा समझें। उसे एक समान नागरिक समझें। अगर आप एक नियोक्ता (Employer) हैं, तो उसे उसकी काबिलियत पर नौकरी दें। अगर आप एक शिक्षक हैं, तो उसे प्रेरित करें।

डॉ. सिंह का जीवन यही सिखाता है कि “विकलांगता शरीर में होती है, मन में नहीं।” अगर मन मजबूत हो, तो टूटे हुए पैरों से भी एवरेस्ट फतह किया जा सकता है।

आप कैसे जुड़ सकते हैं?

दिव्यांग अर्जुन की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है, यह हर रोज एक नया अध्याय लिख रही है। दिशा मंच से जुड़ने के लिए आप उनके ब्लॉग को फॉलो कर सकते हैं, सोशल मीडिया पर #DivyangArjun मुहिम का हिस्सा बन सकते हैं, या फिर अपने आसपास किसी एक दिव्यांग की मदद करके इस यज्ञ में आहुति दे सकते हैं। याद रखें, हम सब मिलकर ही एक समावेशी भारत (Inclusive India) का निर्माण कर सकते हैं। जय हिन्द, जय दिव्यांग!

Dr. Pavitra Singh IIT,

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Meta Description

“$जानें दिव्यांग अर्जुन (डॉ. पवित्र सिंह) की संघर्ष गाथा। 1989 से शुरू हुआ सफर, IIT से PhD और दिशा मंच (DISHA MUNCH) के जरिए लाखों दिव्यांगों की मदद। एक संपूर्ण गाइड।”

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